पूर्वी चंपारण जिले के पर्यटन स्थल --
पूर्वी चंपारण जिले के पर्यटन स्थल --
पूर्वी चम्पारण जिला का भू भाग धार्मिक एवं सांस्कृतिक है। इस भू भाग में अनेक धार्मिक एवं ऐतिहासिक प्रयत्न स्थल हैं। उनमे से कुछ प्रमुख हैं।
सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर, अरेराज ---
स्कन्द पुराण में वर्णित यह शिव मंदिर अत्यंत प्राचीन एवं पवित्र है। इस शिव लिंग की पूजा चंद्र ने किया था और उन्हें शाप से मुक्तिमुक्ति मिली थी। इसलिए इस स्थान का नाम सोमेश्वर महादेव है। पुरे देश में पंचमुखी महादेव यहीं है। कहा जाता है की माता सीता ने इसी शिव मन्दिर में पूजा की थी। राजा युधिष्ठिर के राज्य चले जाने के बाद यही पर पूजा किये थे उन्हें पुनः राज्य की प्राप्ति हुई थी।
अशोक स्तम्भ , लौरिया ---
बौद्ध स्तूप ,केसरिया ----
यह दुनिया का सबसे ऊँचा बौद्ध स्तूप है। केसरिया बौद्ध स्तूप की ऊँचाई आज भी 104 फीट है जबकि इंडोनेसिया स्थित विश्व प्रसिद्ध बोरोबदुर (जावा) बौ़द्ध स्तूप की ऊँचाई 103 फीट है। ये दोनों स्तूप छह तल्ले वाला है जिसके प्रत्येक दिवाक खण्ड में बुौद्ध की मूर्तिया स्थापित है। स्तूप में लगी ईटे मौर्य कालिन है। सभी मूर्तियां विभिन्न मुद्राओं में है। 1861-62 में इस स्तूप के सम्बन्ध में जनील कर्निंधम ने लिखा हैं कि केसरिया का यक स्तूप 200 ई0 से 700 ई0 के मध्य कभी बना होगा। चीनी यात्री फाहियान के अनुसार केसेरिया के देउरा स्थल पर भगवान बुद्ध अपने महापरिनिर्वाण के ठीक पहले वैशाली से कुशीनगर जाने वक्त एक रात का विश्राम किया था तथा साथ आये वैशाली के भिझुकों को अपना भिक्षा पात्र प्रदान कर कुशीनगर के लिए प्रस्थान किया। आज केसरिया बौद्ध स्पूत देखने विदेशों से हजारो हजार पर्यटक एवं बौद्ध भिक्षुक रोज आते है।
गांधी संग्रहालय , मोतिहारी ---
15 अप्रैल 1917 को महात्मा गाँधी चम्पारण आये थे। नील की खेती कर रहे किसानो पर अंग्रेजो के अत्याचार से दुखी हो कर उनका दुःख दर्द जानने आये थे। मोती हरी में वो जहाँ ठहरे थे आज वही जगह गाँधी संग्रहालय है। गॉधी जी ने अपनी आत्मा की आवाज पर सरकारी आदेश की अवहेलना की जो सत्याग्रह का भारत में पहला प्रयोग था और प्रशासन ने उनपर किया गया मुकदमा वापस ले लिया। तत्कालिन एसडीओ की अदालत में जाकर गॉधी जी ने अपना वचान दिया था और आदेश न मानने का कारण बताया था उसी स्थान पर सत्याग्रह स्मारक स्तंभ का निर्माण किया गया है इस 48 फीट लम्बे स्मारक स्तंभ की आधार शिला 10 जून 1972 को तत्कालिन राज्यपाल देवकानत वरूआ ने रखी थी और गॉधीवादी विधाकर कवि ने 18अप्रैल 1978 को इसे देश को समर्पित किया। इस स्मारक स्तंभ का डिजायन प्रसिद्ध वास्तुविद नंदलाल वोस ने किया था। ये सत्यग्रह स्मारक स्तंभ देश में स्वत्रंता आंदोलन की पहली जीत का स्मरण दिलाता है। वर्तमान में इस परिसर में एक गॉधी संग्रहालय का भी निर्माण कराया गया है।
गाँधी स्मारक , चंद्रहिया ---
चंद्रहिया बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में एक गांव है। चंद्रहिया का ऐतिहासिक महत्व है. गांधी जी जब 15 अप्रैल 1917 को मोतिहारी पहुंचे तो उसी रात उन्हें पता चला कि जसौली पट्टी में अंग्रेजों ने किसानों पर अत्याचार किया है. गांधी जी किसानों से मिलने हाथी पर सवार होकर निकले जब चंद्रहिया पहुंचे तो अंग्रेज दारोगा ने गांधी जी को चंपारण कलेक्टर डब्ल्यू बी हेकॉक का नोटिस दिया जिसमें कहा गया था कि वो चम्पारण छोड़ दें. गांधी जी ने इसके खिलाफ एसडीएम की अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ी और सत्य के आधार पर उनकी जीत हुई और किसान निलहों के अत्याचार से मुक्त हुए
मोती झील , मोतिहारी ----
मोती झील मोतीहारी शहर के बीचोबीच स्थित है। शहर की खूबसूरती और बढ़ा देती है।
जॉर्ज ऑरवेल स्मारक --
ऑरवेल का असली नाम था एरिक आर्थर ब्लेयर. जॉर्ज ऑरवेल नाम उन्होंने लेखन के लिए चुना था। दुनिया के अग्रणी लेखकों में शुमार होने वाले जॉर्ज ऑरवेल की जन्मस्थली लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रही. बिहार सरकार ने दिसंबर, 2010 में इसे संरक्षित स्थल घोषित किया था। अंग्रेजी साहित्य के महान लेखक जार्ज ऑरवेल का जन्म २५ जून १९०३ को बिहार के मोतिहारी में हुआ था। उस समय उनके पिता रिचर्ड वेल्मेज्ली ब्लेयर चम्पारण के अफीम विभाग में सिविल अधिकारी थे। जन्म के कुछ दिनों के बाद ऑरवेल अपनी माँ और बहन के साथ इंग्लॅण्ड चले गए जहाँ उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही लेखन आरंभ किया। उनकी लिखी Animal Farm, Burmese Days, A Hanging जैसी कुछ पुस्तकें अंग्रेजी साहित्य की महान कृति है। वर्ष २००४ में रोटरी मोतिहारी तथा जिला प्रशासन के प्रयास से उनके जन्म स्थल की दशा सुधार कर वहाँ एक फलक लगाया गया जिसपर उनका संक्षिप्त जीवन चरित लिखा है।
विश्व कबीर शांति स्तम्भ ---
जिला मुख्यालय से दस किलो मीटर पर पीपराकोठी प्रखंड के बेलवातिया गांव में पूरे भारत का आठवां एवं बिहार का अब तक इकलौता विश्व कबीर शांति स्तंभ स्थापित है इस स्तंभ का निर्माण तत्कालीन महंत स्व० रामस्नेही दास ने २००२ में किया जबकि यह आश्रम १८७५ ई० में तत्कालीन महंत स्व० केशव साहेब ने स्थापित किया इस स्तंभ के अलावा अन्य सभी स्तंभ मध्य प्रदेश शासन के द्वारा बनाये गए है इस आश्रम पर प्रति वर्ष अनंत चतुर्दशी को त्रिदिवाशिये संत सम्मेलन का आयोजन किया जाता है जिसमे देश विदेश के संत महात्मा भक्त का समागम होता है यह आश्रम धार्मिक समाजिक राजनैतिक व अध्यात्मिक साधना का केंद्र रहा है वर्तमान महंथ डॉ त्रिपुरारी दास के नेतृत्व में इस आश्रम का संचालन किया जा रहा है जिनके द्वारा देश विदेश में इस आश्रम के विकास के लिये प्रयास किया जा रहा है इस ऐतिहासिक स्थल के बारे में गौर करें तो आश्रम की स्थापना करने वाले महंथ स्व० केशव साहब ने १८७५ ई० में की और वे १८९५ तक महंथ रहे उसके बाद स्व० श्याम बिहारी दास साहब सन १८९५ से १९०१ ई०, महंथ स्व० रिशाल साहब १९०१ से १९२९ तक, महंथ स्व० ब्रह्मदेव साहब सन १९२९ से १९५४ ई० तक , उसके बाद महंथ स्व० कमल साहेब सन १९५४ से १९७५ तक रहे एव उन्होंने आश्रम के १०० वे स्थापना दिवस पर अपने जीवन काल में ही रामस्नेही दास को महंथ की गदी पर आशिन करते हुए उन्हें महंथ बनाया और महंथ रामस्नेही दास ने अपने काल में ही विश्व कबीर शांति स्तंभ की स्थापना किया तथा वे भी अपने जीवन काल में ही १५ सितम्बर १९९७ को अपना कार्य भार रामरूप दास को सौपा तथा वे सन ३१ मई २००२ को गुजर गए फ़िलहाल के महंथ डॉ० त्रिपुरारी दास को ०७ सितम्बर २०१४ को बनाया गया और तब से उन्ही के नेतृत्व में आश्रम का संचालन हो रहा .









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