पश्चिमी चंपारण जिले का परिचय ---


  पश्चिमी चंपारण  जिले का परिचय --- 



पश्चिम चम्पारण जिला -- यह जिला तिरहुत प्रमंडल का एक जिला है।  इसका मुख्यालय बेतिया है।  इस जिले में 3 अनुमंडल , बेतिया , बगहा और नरकटियागंज हैं।  जिले में कुल 18 प्रखंड गौनहा, चनपटिया, जोगापट्टी, ठकराहा, नरकटियागंज, नौतन, पिपरासी, बगहा-१, बगहा-२, बेतिया, बैरिया, भितहा, मधुबनी, मझौलिया, मैनाटांड, रामनगर, लौरिया, सिकटा  हैं।  इस जिले में कुल 315 पंचायत  और 1483 गांव  हैं। जिले में 2  लोकसभा और 9 विधानसभा सीटें हैं।   जिले के  उत्तर में नेपाल  तथा दक्षिण में गोपालगंज  जिला स्थित है। इसके पूर्व में पूर्वी चपंपारण  और  पश्चिम में इसकी सीमा उत्तर प्रदेश  के पडरौना  तथा देवरिया  जिला  हैं।  

पहले एक ही चम्पारण था।  बाद में उसे पूर्वी और पश्चिम चम्पारण में बाँट दिया गया। 

चंपारण के  वाल्मीकि नगर में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था यही पर  देवी सीता की

   शरणस्थली हैं जिससे यह स्थान  अति पवित्र है।   यहीं पर गांधीजी का प्रथम सत्याग्रह

 शुरू हुआ था।  इसलिए यह स्थान आधुनिक भारत के इतिहास  में अधिक महत्वपूर्ण

 है। 


 राजा जनक के समय यह तिरहुत प्रदेश का अंग था जो बाद में छठी सदी ईसा पूर्व में

 वैशाली के साम्राज्य का हिस्सा बन गया। अजातशत्रु के द्वारा वैशाली को जीते जाने के

 बाद यह मौर्य वंश, कण्व वंश, शुंग वंश, कुषाण वंश तथा गुप्त वंश के अधीन रहा।

 सन ७५० से ११५५ के बीच पाल वंश का चंपारण पर शासन रहा। इसके बाद मिथिला

 सहित समूचा चंपारण प्रदेश सिमराँव के राजा नरसिंहदेव के अधीन हो गया। बाद में

 सन १२१३ से १२२७ ईस्वी के बीच बंगाल के गयासुद्दीन नवाज ने नरसिंह देव को

 हराकर मुस्लिम शासन स्थापित की। मुसलमानों के अधीन होने पर तथा उसके बाद

 भी यहाँ स्थानीय क्षत्रपों का सीधा शासन रहा।

मुगल काल के बाद के चंपारण का इतिहास बेतिया राज का उदय एवं अस्त से जुड़ा है। बादशाह शाहजहाँ के समय उज्जैन सिंह और गज सिंह ने बेतिया राज की नींव डाली। मुगलों के कमजोर होने पर बेतिया राज महत्वपूर्ण बन गया और शानो-शौकत के लिए अच्छी ख्याति अर्जित की। १७६३ ईस्वी में यहाँ के राजा धुरुम सिंह के समय बेतिया राज अंग्रेजों के अधीन काम करने लगा। इसके अंतिम राजा हरेन्द्र किशोर सिंह के कोई पुत्र न होने से १८९७ में इसका नियंत्रण न्यायिक संरक्षण में चलने लगा जो अबतक कायम है। हरेन्द्र किशोर सिंह की दूसरी रानी जानकी कुँवर के अनुरोध पर १९१० में बेतिया महल की मरम्मत करायी गयी थी। बेतिया राज की शान का प्रतीक यह महल आज यह शहर के मध्य में इसके गौरव का प्रतीक बनकर खड़ा है। 

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